यह ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ का दृश्य है, पहचानना कोई मुश्किल काम नहीं। आमतौर पर हम इस दृश्य का प्रयोग लोगों को लगातार एक ही दिशा में किए जा रहे श्रम का फल दिखाने के लिए करते हैं। ज्यादातर लोगों को याद भी नहीं होता कि इस फिल्म में उन्होंने कहीं नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी को देखा भी है। वे एक चोर के इतने छोटे से किरदार में मार खाने के बाद गायब होते नज़र आते हैं—किसे याद रहेगा? उस समय तक नवाज़ुद्दीन कोई बड़े-नामी सितारे नहीं थे; एक डायलॉग सुनील दत्त जैसे एक्टर के सामने बोलने का मौका मिल गया, यही बहुत था।
आज यह दृश्य दिखाने का कारण दूसरा है। इसमें सुनील दत्त जिस किरदार में हैं, वे बताते हैं ना—”इस भीड़ को देखो!” वह वाला हिस्सा यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है। कोई पत्नी से लड़कर आया है, किसी के बच्चे उसकी बात नहीं सुनते, किसी की नौकरी छूट गई है—हर कोई नाराज और तनाव में है। एक बार गर्दन घुमाकर एक विशेष राजनीतिक दल या उससे जुड़े गैर-राजनीतिक संगठनों के लोग भी देख लेते, तो उन्हें भी यही दृश्य दिख जाता। हर कोई नाराज़ है! कुछ लिहाज़ में बोल नहीं रहे। कुछ जो सीधा “सरकारी कटोरी से मलाई चाट रहे बिलौटे” कह भी देते हैं, उन्हें डपटकर चुप करवाने की कोशिश की जाती है।
असल में स्थिति बिल्कुल वैसी ही है, जैसी पूरे दिन में किसी से मुलाकात होने पर जब कोई पूछे—”कैसे हो भाई?” तब होती है। क्या हम सच बताते हैं? हो सकता है कि घर में कोई बीमार हो, पैसे की तंगी चल रही हो, कोर्ट-कचहरी का कोई मामला फँसा हो, या किसी सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ रहे हों; लेकिन हमारा जवाब वही तयशुदा होता है—”बढ़िया भाई!” कोई भी हालचाल पूछे, तो हम असली हाल नहीं बताना शुरू करते, “सब ठीक-ठाक ही है” कहकर बात टाल देते हैं। बिल्कुल उसी तरह हुआ, जैसा अभी एक राजनीतिक दल और उससे जुड़े गैर-राजनीतिक संगठनों के कार्यकर्ताओं के बीच देखने को मिला। ऊपर से “सब ठीक” कहा गया, लेकिन असल में सब ठीक नहीं था!
वास्तविकता उन्हें पता नहीं थी, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। जब हमलोग “क्या हाल?” के उत्तर में “बढ़िया भाई” कहकर आगे की बातों पर बढ़ जाते हैं, उस समय भी सुनने वाले को बखूबी पता होता है कि यह पूरा सच है या नहीं। करीबी लोगों को घर-परिवार की हालत का पता या अनुमान भला कैसे नहीं होगा? उसने आगे पूछा था या नहीं, यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि उससे हमारे संबंध कैसे हैं। यहाँ पर काम आता है भगवद्गीता के तीसरे अध्याय का छठा श्लोक:
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥
इसमें कहा तो यह गया है कि जो मूढ़बुद्धि मनुष्य अपनी समस्त कर्मेंद्रियों को बाहर से रोककर बैठता है, लेकिन मन ही मन उन इंद्रियों के विषयों (भोगों) का चिंतन करता रहता है, वह मनुष्य अपने आप को धोखा देता है और ‘मिथ्याचारी’ (पाखंडी) कहलाता है। अब प्रश्न यह है कि क्या यह नियम केवल भोगों का चिंतन करने पर ही लागू होगा, या फिर वस्तुस्थिति कुछ और हो, मन में कुछ और चल रहा हो और आप बता कुछ और रहे हों—तब भी लागू होगा? और जब यह नियम यहाँ लागू होता है, तो फिर गीता के तीसरे अध्याय के २३वें श्लोक (और ४.११) का वह प्रसिद्ध हिस्सा “मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः” यानी “सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं” भी पूरी तरह लागू होगा।
अब जब वर्तमान स्थितियों से मिलाकर देखें, तो समझ में आता है कि सत्ताधारी तो मिथ्याचारी और दंभी हुए जा रहे थे। परिणाम यह हुआ कि उनके आसपास के ‘सरकारी कटोरी से मलाई चाटने वाले बिलौटे’ भी उनको देखकर उन्हीं के जैसा झूठा और चाटुकारिता भरा व्यवहार करने लगे, और सच किसी ने किसी को बताया ही नहीं! अब जो परिणाम हुए हैं, वे तो हम लोग देख ही चुके हैं! सरकारी कटोरी से मलाई चाट रहे बिलौटों का अहंकार कम होता, या सचमुच आम लोगों से उनके सम्बन्ध अच्छे बचे होते, तो उन्हें सच पता भी होता, और शायद वो अपने आकाओं को सच बता भी पाते।
बाकी राजनीति और फिल्म के बहाने श्लोकों के बारे में जो बताया है, वह सिर्फ नर्सरी के स्तर का है क्योंकि हमें उतने तक ही आता था। हाँ, आध्यात्मिक स्तर पर भी इनका गहरा असर होता है, लेकिन पीएचडी के लिए भगवद्गीता आपको स्वयं उठाकर पढ़नी पड़ेगी—यह तो आपको याद ही होगा!