कर्म जो पीछा नहीं छोड़ते

कोई नशे में अपनी पत्नी और बेटी को बेच दे, बाद में पछतावा करे, शराब छोड़ दे और मेहनत से शहर का मेयर बन जाए तो पाप पीछा छोड़ देंगे क्या? थॉमस हार्डी ने जब “मेयर ऑफ कॉस्टरब्रिज” लिखी थी, तो उसकी कहानी मूलतः यही थी। जब यश चोपड़ा अपनी पहली फिल्म बनाने निकले तो उन्हें ये कहानी मालूम थी। इसी कहानी को थोड़ा बदलकर यश राज फिल्म्स की पहली फिल्म “दाग” बनी थी। फिल्म में राजेश खन्ना और शर्मीला टैगोर थे, गानों के लिए भी याद की जाती है। कहानी मोटे तौर पर कुछ यूँ है कि राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर, कॉलेज के दिनों में एक-दूसरे से प्यार करते हैं। दोनों जल्दी ही शादी कर लेते हैं और हनीमून के लिए निकल पड़ते हैं।

 

रास्ते में खराब मौसम के कारण वे सुनील (राजेश खन्ना) के बॉस के बंगले पर रुकते हैं। वहाँ बॉस का बेटा, धीरज कपूर (प्रेम चोपड़ा), सोनिया को अकेला पाकर उसका बलात्कार करने की कोशिश करता है। सुनील समय पर पहुँच जाता है, दोनों में लड़ाई हो जाती है और सुनील धीरज को मार डालता है। सुनील को हत्या का दोषी ठहराया जाता है और उसे उम्रकैद की सजा सुनाई जाती है। जेल ले जाते समय पुलिस वैन का एक्सीडेंट हो जाता है। सब मारे जाते हैं, लेकिन सुनील किसी तरह बच जाता है। सब उसे मृत मान लेते हैं। पाँच साल बाद सोनिया अपने बेटे पिंकू को लेकर एक नए शहर में स्कूल टीचर बन गई है।

 

उधर सुनील नई पहचान बनाकर “सुधीर” के नाम से रह रहा होता है। वह शहर का सम्मानित व्यक्ति है और मेयर पद के उम्मीदवार भी है। वहाँ वह चांदनी (राखी) से उसकी मुलाकात हो चुकी है, जो अविवाहित माँ बनने वाली है (उसका प्रेमी उसे धोखा दे चुका है)। सुनील चांदनी की मदद के लिए उससे शादी कर लेता है, ताकि बच्चे को पिता का नाम मिल सके। यह शादी शुरू में नाम मात्र की होती है। धीरे-धीरे सुनील और चांदनी के बीच प्यार विकसित हो जाता है। एक दिन उसी शहर में आ गई सोनिया सुनील को पहचान लेती है। दोनों के बीच पुराना प्यार फिर जाग उठता है।

 

अब सुनील दो महिलाओं के बीच फँस जाता है — एक उसकी पहली पत्नी सोनिया और दूसरी चांदनी, जिसके साथ उसने नया जीवन बसाया है! फिल्म और उपन्यास की कहानियों की तुलना करें तो फिल्म सुखांत हैं, दोनों युवतियाँ एक ही सुनील को अपना लेती हैं, उपन्यास दुखांत है, हेनचर्ड भुला दिया गया, अकेलेपन में मरता है। एक बात जो दोनों में कॉमन है, वो ये है कि कर्म दोनों में ही नायक (मुख्य किरदार) का पीछा नहीं छोड़ता। नाम-पेशा-शहर सब बदल लिया, वर्षों बीत गए, और कर्म एक दिन फिर दरवाजे पर दस्तक देने पहुँच जाता है।

 

इतने पर अनुमान लगा ही लिया होगा कि फिल्म-उपन्यास के बहाने हमने फिर से #भगवद्गीता पढ़ा दी है। ये कर्मों का पीछा न छोड़ना काफी कुछ पन्द्रहवें अध्याय के आठवें श्लोक की तरह है –

 

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।15.8

 

इस श्लोक में कहा गया है कि जैसे वायु गंध को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है, कुछ वैसे ही शरीर बदल जाने पर भी कर्मफल, मन-इन्द्रियों का स्वभाव एक शरीर से दूसरे शरीर में पहुँच जाएगा। इस श्लोक के साथ ही चौथे अध्याय का सत्रहवाँ श्लोक भी पढ़ लेना चाहिए –

 

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।4.17

 

कर्म, अकर्म, तथा विकर्म को अच्छी तरह समझना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है। कर्म तो वो है जो करने योग्य है, अकर्म वो हुआ जो करने योग्य तो था लेकिन किया नहीं गया, और विकर्म शास्त्रों में निषिद्ध कर्मों को कहते हैं। यानी कि पहले ये तय करना है कि कर्म उचित है या नहीं, फिर करने से कतरा गए और अकर्म हो गया तो वो भी नहीं चलेगा। कुल मिलाकर कर्मों का फल, उनकी गति समझना मुश्किल है, बस इतना तय है कि उनका फल आज नहीं तो कल आएगा ही आएगा!

 

बाकी उपन्यास और फिल्म की कहानी के बहाने भगवद्गीता में कर्मों के उल्लेख के बारे में जो बताया है, वो बस नर्सरी स्तर का है, उससे अधिक हमें आता नहीं। पीएचडी के लिए भगवद्गीता स्वयं पढ़नी चाहिए, ये तो याद ही होगा!

 

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