हाल की घटनाओं में प्रेम का त्रिकोण तो शायद नीले ड्रम से लेकर पहाड़ी से धकेलने तक में दिख ही गया होगा। वैसे भी पहाड़ी से धकेलने जैसा कुछ “एक हसीना थी, एक दीवाना था…” वाले गाने में कई पुराने दौर के लोगों को याद ही होगा। हिंदी फिल्में या कहिये उर्दूवुड के सिनेमा में भी जिन कुछ चीजों को “फ़ॉर्मूला” कहा जाता है, उनमें यह दिखता ही रहता है। ये फ़ॉर्मूले ऐसे घिसे-पिटे से नुस्खे होते हैं जो कहानी में, या दृश्यों में डाले हुए दिख जाएँगे। इसका एक उदाहरण देखना हो तो वैसे तो प्रेम कथाओं में नायक को नायिका से और नायिका को नायक से ही प्रेम होता है, लेकिन एक फ़ॉर्मूला ऐसा भी होता है जिसमें नायक दो होते हैं, मगर नायिका एक ही होगी।
एक नायक थोड़ा शक्तिसंपन्न सा होगा, सामाजिक-आर्थिक स्थिति में श्रेष्ठ, दिखने में बढ़िया, और दूसरा वाला थोड़ा सा कमजोर सा होगा। उदाहरण याद करने हैं तो जरा ‘हम दिल दे चुके सनम’ को याद कर लीजिए। ऐसी कई फ़िल्में हैं जहाँ हीरो अपनी प्रेमिका या पत्नी की ख़ुशी के लिए उसे किसी और के हाथों में सौंप देता है। ‘कल हो ना हो’ में शाहरुख खान (अमन) नैना (प्रीति जिंटा) से प्यार करता है, लेकिन अपनी जानलेवा बीमारी के बारे में जानकर, वह पीछे हट जाता है और नैना की शादी रोहित (सैफ अली खान) से तय करवा देता है। ज्यादा मशहूर फिल्म ‘साजन’ याद कर लीजिए जिसमें संजय दत्त (अमन/सागर) और माधुरी दीक्षित (पूजा) एक-दूसरे की भावना को जानते-समझते हैं, लेकिन जब सलमान खान (आकाश) को पूजा से प्यार होता है, तो अमन अपने दोस्त की खुशी के लिए खुद को रास्ते से हटाने और खुद को बुरा साबित करने का नाटक करने लगता है।
सिर्फ नयी फिल्मों में यह फ़ॉर्मूला दिखेगा ऐसा भी नहीं, पुरानी राज कपूर वाली ‘संगम’ याद कीजिए जिसमें सुंदर (राजेंद्र कुमार) और गोपाल (राज कपूर) दोनों राधा (वैजयंतीमाला) से प्यार करते हैं। राधा वास्तव में गोपाल से प्यार करती है, लेकिन अपने जिगरी दोस्त सुंदर की खुशी के लिए गोपाल खुद के प्यार का बलिदान दे देता है। कमल हासन वाली ‘सागर’ में कमल हासन (राजा) मोना (डिंपल कपाड़िया) से प्यार करता है। जब उसे एहसास होता है कि मोना का पहला प्यार रवि (ऋषि कपूर) ही है, तो वह अपने रास्ते से हट जाता है। तो ‘हम दिल दे चुके सनम’ वाला अजय देवगन ही केवल सलमान खान अर्थात ‘समीर: हवा का झोंका’ के जीवन में आ जाने से किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं होता, यह फ़ॉर्मूला ही है जो कई फिल्मों में बार-बार दोहराया गया है।
अच्छा इस फ़ॉर्मूले की एक खास बात और है। इसमें जो नायक अपने प्रेम का ‘दान’ कर डालता है, मतलब अपनी पत्नी-प्रेमिका को किसी और के साथ भेज देता है, उसकी छवि हमेशा ‘बेचारा भला आदमी’ की दिखेगी। अपने जीवन का क्या होगा यह सोचे बिना, पूरे भविष्य को चौपट करके यह क्यूट (हाँ क्यूट ही लिखा है, कोई और मिलता-जुलता शब्द न ढूंढें), हाँ, क्यूट व्यक्ति, लड़की को जाने देता है। संभवतः आगे उसका परिवार नहीं होगा, दूसरे विवाह की संभावना आदि नगण्य है, इन सबकी वह तो क्या दर्शक भी नहीं सोचता। यह फ़ॉर्मूला थोड़ा सा बदलता है ‘धड़कन’ फिल्म में। इसका गाना ‘दूल्हे का सेहरा सुहाना लगता है…’ सभी शादियों में सुना ही होगा।
फ़ॉर्मूला की बाकी सारी चीजें यहाँ जस की तस हैं। प्रेम का त्रिकोण है, मतलब सुन्दर सी नायिका शिल्पा शेट्टी ‘पियवा से पहले हमार रहलू…’ की तर्ज पर प्रेम तो पहले चिरकुट से सुनील शेट्टी से करती होती है, लेकिन जाकर शादी अक्षय कुमार से कर लेती है। अक्षय कुमार का चरित्र भी बिलकुल फ़ॉर्मूला के हिसाब से ‘बेचारा भला आदमी’ वाला ही गढ़ा गया है। असल जीवन में ऐसे लोगों को नीले ड्रम में जाते या सांप से डसवाए जाने के किस्से हम लोगों ने सुने-पढ़े ही हैं। लेकिन ‘धड़कन’ में एक चीज जो बदल जाती है, वह है दूसरे वाले प्रतिनायक का किरदार। वह फ़ॉर्मूला की तरह भला आदमी नहीं होता बल्कि अपनी भाषा में कहें तो खच्चर था। स्थितियाँ उसके अनुकूल नहीं थीं तो उनसे लड़-भिड़कर वह अपनी स्थिति बदलता है और वापस नायिका पर दावा ठोकने पहुँच जाता है – ‘पियावा से पहिले हमार रहलू…’! फ़ॉर्मूला में यहाँ यह भी बदलता है कि नायक अपनी नायिका को उसे ‘दे’ नहीं देता।
ये जो बेचारे भले आदमी द्वारा अपने प्रेम का ‘दान’ कर देने, नायिका को वापस उसके असली प्रेमी को सौंप देने वाली व्यवस्था है, इसके बारे में भगवद्गीता के हिसाब से देखने चलें तो (यज्ञ या) ‘दान’ तीन प्रकार का हो सकता है जिसके बारे में सत्रहवें अध्याय के बीसवें से देखिए, यहाँ बाईसवें श्लोक में तामसिक दान के बारे में बताया गया है:
अदेशकाले यद्दानमपात्रेश्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
यानी ऐसा दान जो गलत स्थान पर या अनुचित समय पर, किसी कुपात्र को या बिना आदर भाव के अथवा अवमानना के साथ दिया जाता है, उसे तमोगुणी दान माना जाता है। अब प्रश्न है कि ‘धड़कन’ का अक्षय कुमार कर क्या रहा था? वह देखता है कि खड़ूस से स्वभाव वाले, घमंडी-अहंकारी, दूसरों को नीचा दिखाने पर तुले सुनील शेट्टी वाले किरदार को शिल्पा शेट्टी सौंप देना तो कुपात्र को दान देना हो जाएगा। इसलिए वह तमोगुणी दान नहीं करता। फिल्म का अक्षय कुमार अपनी इस हरकत के लिए बुरा पात्र भी नहीं लगता। आपके दान का सही उपयोग हो, जिस समय आवश्यकता हो, ऐसे सही समय दिया गया हो, सही देश में, सही व्यक्ति को मिले, यह जांचना दानकर्ता का दायित्व है। गुप्तदान दिया था जी, इसलिए पूछने नहीं जाएँगे जी, वाली कामचोरी नहीं चलेगी।
बाकी ‘धड़कन’ और ‘हम दिल दे चुके सनम’ या ‘साजन’ जैसी फिल्मों के जरिये जो तमोगुणी, रजोगुणी और सतोगुणी दान का अंतर समझाया, वह नर्सरी के स्तर का है क्योंकि उससे ज्यादा हमें आता नहीं। आपको मंदिरों में दिए अपने दान का भी स्वयं ध्यान रखना है, यह श्लोकों में कहाँ है यह बता भर दिया है। पीएचडी के लिए भगवद्गीता स्वयं पढ़कर देखना होगा, यह तो याद ही होगा!
