“तुम्हारी सोच वैज्ञानिक नहीं है!”—यह जुमला पिछड़ी और विदेशी सोच के लोग अक्सर उछालते हुए मिल जाते हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि यहाँ किस ‘वैज्ञानिक सोच’ की बात हो रही है, और आखिर विज्ञान की परिभाषा क्या है?
विज्ञान को केवल एक विषय के रूप में नहीं, बल्कि “ज्ञान प्राप्त करने की एक व्यवस्थित पद्धति” के रूप में देखा जाता है। विज्ञान के लिए प्रयोग होने वाला अंग्रेजी शब्द Science लैटिन के ‘Scientia’ से आया है, जिसका सीधा अर्थ होता है—ज्ञान (Knowledge)। इस प्राचीन परिभाषा के अनुसार, किसी भी विषय का व्यवस्थित और गहरा ज्ञान ‘विज्ञान’ कहलाता था, चाहे वह प्रकृति से जुड़ा हो या समाज से। यानी शुरुआती दौर में विज्ञान का अर्थ बहुत व्यापक था।
गैलीलियो का समय आते-आते बातें बदलने लगीं और गैलीलियो गैलीली ने विज्ञान को एक नई परिभाषा दी। उन्होंने कहा, “प्रकृति की किताब गणित की भाषा में लिखी गई है।” इस फ्रेमवर्क के तहत, केवल उसी ज्ञान को ‘वैज्ञानिक’ माना जा सकता है जिसे गणितीय समीकरणों, संख्याओं और माप (Measurement) के रूप में व्यक्त किया जा सके। यदि किसी घटना को मापा नहीं जा सकता, तो वह इस दायरे से बाहर थी।
उदाहरण के लिए, खाड़ी देशों में युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की कीमतें बढ़ गईं। इससे भारत में जिन महिलाओं को उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त सिलेंडर मिला था, वे महंगा होने के कारण गैस दोबारा नहीं भरवा सकीं। अब, इससे उन परिवारों को कितना भावनात्मक या सामाजिक नुकसान हुआ, इसे सही-सही नापकर संख्याओं में नहीं लिखा जा सकता; इसलिए गैलीलियो के दृष्टिकोण से यह एक ‘वैज्ञानिक घटना’ नहीं मानी जाएगी।
इसके बाद फ्रांसिस बेकन ने वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method) की नींव रखी, जिसे ‘बेकनियन दर्शन’ कहा जाता है। इसमें कहा गया कि ज्ञान केवल अमूर्त विचारों या तर्कों से नहीं, बल्कि अनुभव और अवलोकन (Observation) से आता है। यानी नई परिभाषा यह बनी कि विज्ञान वह है जिसे हम अपनी इंद्रियों (Senses) द्वारा महसूस कर सकें, प्रयोग (Experiment) कर सकें और तथ्यों को इकट्ठा करके किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकें। इसे अनुभववाद (Empiricism) भी कहा जाता है।
इसे समझने के लिए भारत पर हुए विदेशी आक्रमणों का उदाहरण लिया जा सकता है। इन हमलों में कितने लोग मारे गए, कितने गुलाम बनाकर बेच दिए गए, या कितनी धन-सम्पदा का नुकसान हुआ, इसका सटीक जोड़-घटाव उपलब्ध नहीं है, केवल एक अनुमान है। इसे आप पुनः अनुभव करके या प्रयोगशाला में प्रयोग करके भी नहीं जांच सकते, क्योंकि उपनिवेशवादी फिर से हमला करने के लिए पैदा हों और वैसा ही राजशाही वाला दौर वापस आ जाए, यह संभव नहीं है। अतः इतिहास में यह घटना घटित तो हुई, लेकिन बेकन के कड़े मापदंडों के अनुसार इसे भी ‘वैज्ञानिक दृष्टि’ से प्रमाणित नहीं माना जा सकता।
इसके बाद कार्ल पॉपर का दौर आया। 20वीं सदी के इस दार्शनिक ने विज्ञान और छद्म विज्ञान (Pseudo-science) के बीच अंतर करने के लिए एक क्रांतिकारी परिभाषा दी। अब कहा गया कि कोई भी सिद्धांत तब तक वैज्ञानिक नहीं है, जब तक कि उसे गलत साबित करने का कोई तरीका (Testability/Falsifiability) मौजूद न हो। यानी विज्ञान अटल और शाश्वत सत्यों का जड़ संग्रह नहीं है, बल्कि यह केवल ‘परखने योग्य कथनों’ (Testable Statements) का एक गतिशील समूह है। उदाहरण के लिए, “कल बारिश हो सकती है” एक वैज्ञानिक कथन है क्योंकि इसे कल परखा जा सकता है, लेकिन “सब कुछ भगवान की इच्छा से होता है” को किसी भी प्रयोग से गलत साबित (Falsify) नहीं किया जा सकता, इसलिए यह आधुनिक विज्ञान के दायरे से बाहर है।
एक आम धारणा है कि विज्ञान हमेशा “क्यों” और “कैसे” (कार्य-कारण संबंध या Causality) का जवाब देता है। लेकिन वैज्ञानिक दर्शन के अनुसार, कार्य-कारण संबंध की पूर्ण व्याख्या होना विज्ञान की अनिवार्य शर्त नहीं है। इसे न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम में देखा जा सकता है। जब न्यूटन ने यह नियम बनाया और गणितीय रूप से सिद्ध किया कि सेब नीचे क्यों गिरता है, तो इसे ‘वैज्ञानिक’ कहा गया क्योंकि तब गणितीय समीकरणों का दौर था। लेकिन गुरुत्वाकर्षण के पीछे का असल कारण (Causality) क्या है, यह वे भी पूरी तरह नहीं समझा सके थे।
जब यह पता चला कि उनके सदियों पहले महर्षि कणाद इस पर लिख चुके थे, तो इस नियम की ‘वैज्ञानिकता’ पर नए सिरे से विमर्श होने लगा (तब तक वैश्विक पटल पर भारतीय दर्शन भी अधिक प्रचलित होने लगा था)। बाद में अल्बर्ट आइंस्टीन ने स्पेस-टाइम (अंतरिक्ष-समय के घुमाव) के माध्यम से इस नियम के पीछे के असल कारण को समझाया। इस तरह यह माना गया कि न्यूटन का नियम अधूरा होते हुए भी अपने फ्रेमवर्क में पूरी तरह वैज्ञानिक था।
‘पीछे का कारण क्या है’—यह प्रश्न ही हमें फिर से उठाकर भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के (62वें और 63वें श्लोक) पर ले आता है:
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ 62॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ 63॥
व्यक्ति के पतन या नाश होने का मूल कारण क्या है? बुद्धिनाश। और बुद्धिनाश हुआ स्मृति के भ्रमित होने के कारण। स्मृति का नाश सम्मोह (Delusion) से हुआ था, सम्मोह आया क्रोध से, क्रोध जन्मा कामना (वासना/अधूरी इच्छा) से, और कामना पैदा हुई थी किसी एक विषय (वस्तु/व्यक्ति) का लगातार ध्यान या चिंतन करने से। यानी यहाँ मानव मनोविज्ञान की घटनाओं का वही क्रमबद्ध, तार्किक और सटीक अध्ययन किया गया है, जो केवल अंधविश्वास पर नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष प्रमाणों और व्यावहारिक अवलोकनों पर आधारित है।
सरल शब्दों में कहें तो, विज्ञान सोचने और जानने का एक ऐसा तरीका है, जहाँ पहले जिज्ञासावश सवाल पूछा जाता है, फिर अवलोकन और प्रयोग किया जाता है, और अंत में निष्कर्ष निकाला जाता है—जो हमेशा भविष्य के परीक्षणों और सुधारों के लिए खुला रहता है। तो इस तरह हम पाते हैं कि जो “वैज्ञानिक सोच” की बात करो, साइंटिफिक टेम्परामेंट डेवेलप करो जैसी बातें कर रहे होते हैं, वो अक्सर सही मतलब न समझ पाए, भटके हुए तथाकथित नौजवान हो सकते हैं। वरना धार्मिक है या वैज्ञानिक, ये अंतर बता पाते न?
बाकी अंत में, #भगवद्गीता के ही आदेश (18.33) की तरह “यथेच्छसि तथा कुरु” (जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा ही करो/जांचो) वाली बौद्धिक स्वतंत्रता आपके पास है या नहीं, यह भी देख लेना चाहिए। आपके पास ऐसी स्वतंत्रता है?
#गीतायन #Gitayan #Geetayan #Gita
वैज्ञानिक सोच और धर्म
