देवानंद की गाइड और असुरों के लक्षण

मंदिर में साधु बना बैठा राजू गाइड असल में एक चोर था। वैसे चोर कहना तो बहुत सही नहीं होगा क्योंकि उसने जो किया था उसे पक्का-पक्का चोरी नहीं कह सकते। उसने जिस नृत्यांगना को सफलता के शिखर पर पहुँचा दिया था, उसके फर्जी दस्तखत करके पैसे निकालने की कोशिश में बैंक वालों ने उसे जेल पहुँचा दिया था। चूँकि उसकी नृत्यांगना पत्नी ने उसके साथ जैसा व्यवहार किया था, इसलिए वह उसके पास वापस नहीं गया। जेल से उसके छूटने के दिन उसकी माँ उसे देखने जरूर आई थी (माँ आ ही जाती है), लेकिन अच्छे व्यवहार के कारण वह थोड़ा पहले छूट गया था तो माँ को भी मिला नहीं। वापस माँ के पास अपने गाँव कैसे जाता? उसे तो नृत्यांगना के चक्कर में पहले ही छोड़ आया था!
चुनांचे राजू गाइड एक गाँव के पास मंदिर में पड़ा था। किसी साधु ने भटकते युवा को अपनी भगवा चादर ओढ़ा दी थी, और भगवा कपड़ों में उसे साधु मान लिया गया था। तो कभी पीछे फ्लैशबैक में और कभी आगे जाती इस फिल्म में जब तक आप शुरू कहाँ से है और खत्म कहाँ, यह जोड़ें, कहानी आपको रोक लेती है। साधु बन जाने से राजू गाइड की दिक्कतें समाप्त भी नहीं हुईं। जिस गाँव में वह रुका था, वहाँ अकाल पड़ गया और खाने के लाले पड़ने लगे। पशु भूखे मरने लगे, और राशन के लिए गाँव वाले एक दूसरे का सर फोड़ने को तैयार थे। लड़ाई-झगड़े की बात सुनकर साधु बने राजू गाइड ने कह दिया कि वह खाना नहीं खाएगा और गाँव के एक कम बुद्धि वाले ने मान लिया कि बारिश के लिए साधु महाराज उपवास करने वाले हैं।
जब उसने गाँव वालों को यह बात बताई तो पहले तो मुखिया को राजू गाइड ने बताना चाहा कि वह चोर है, साधु नहीं; लेकिन लोगों ने मान लिया कि धर्म के रास्ते टेढ़े-मेढ़े होते हैं। कैसे कोई डाकू वाल्मीकि बन जाए, कहा नहीं जा सकता। चुनांचे राजू गाइड को उपवास रखना पड़ा। उसने भागने की असफल कोशिशें भी कीं लेकिन उपवास से आत्मा शुद्ध होती गयी और राजू गाइड साधु होता गया। फिल्म में उसके साधु बन जाने के बाद का एक दृश्य है जिसमें नृत्यांगना और उसकी पुरानी प्रेमिका कार से उतरकर पैदल उसके मंदिर की ओर चलती है। देखने लायक दृश्य है, अगर फिल्म देख रहे हों तो याद रखिएगा।
मंदिर के रेतीले रास्ते से काफी पहले सड़क पर गाड़ी छोड़कर वह मंदिर की ओर रवाना होती है। आस-पास चल रहे और कई ग्रामीणों की भीड़ है। कोई अपने बच्चे को लिए जा रहा है, कोई पत्नी-परिवार के साथ बढ़ा चला जा रहा है। गरीब-साधारण लोगों की भीड़ में वह प्रसिद्ध हो चुकी नृत्यांगना भी बढ़ी चली जा रही है। एक-एक करके जेवर छूटते जाते हैं – कानों से झुमके, फिर हार। शुरू के दृश्य जो “वहाँ कौन है तेरा, मुसाफिर, जाएगा कहाँ…” वाले गीत के साथ हैं, उससे मिलाकर देखिएगा तो कभी जैसे राजू गाइड का हुलिया जेल से निकलने, साधुओं की टोली के पीछे चल पड़ने और अंत में मंदिर तक पहुँचने की लम्बी सी यात्रा में बदला था, वैसे ही इस छोटी सी यात्रा में नायिका बदल जाती है। शायद किसी के लिए सफर लम्बा होता है, किसी का छोटा। हो सकता है कि कितनी जोर से माया से चिपके हैं, इस पर भी निर्भर हो।
कई फ़िल्में हैं जो प्रसिद्ध या कम प्रसिद्ध पुस्तकों पर आधारित हैं। कई भाषाओं में कई फ़िल्में तो एक, जैसे “कोहबर की शर्त” पर “नदिया के पार” बनी। एक कहानी “मारे गए गुलफाम” पर “तीसरी कसम” बना दी गयी। तुलना करके देखेंगे तो मूल कहानी पहले पढ़ लेने पर फिल्म देखते समय ऐसा लगता है कि कहानी की तो फिल्म बनाने के क्रम में हत्या ही कर दी गयी है। गाइड फिल्म के साथ थोड़ी अच्छी बात यह रही कि यह काफी हद तक उपन्यास के करीब ही थी। अंग्रेजी में लिखी आर. के. नारायण की ‘गाइड’ कई लोगों ने पाठ्यक्रम में भी पढ़ रखी होगी। उन्हें फिल्म से थोड़ी निराशा हो सकती है, शेखूलरिज्म का तड़का लगा भी दिख सकता है; लेकिन ज्यादातर लोगों का पूरी किताब पढ़ लेने लायक धैर्य-साहस तो होता नहीं, इसलिए उन्हें फिल्म अच्छी ही लगेगी।
,
ओह हाँ, फिल्म यहाँ तक देख चुके हों तो एक बार भगवद्गीता से आसुरी सम्पदा के लक्षण (अध्याय 16, श्लोक 4) जरूर देखकर राजू गाइड से मिला लीजिएगा। सबसे पहले आता है दम्भ यानी धर्म या अच्छे कर्मों का दिखावा करना और पाखंड करना। शुरू में राजू गाइड यही कर रहा होता है, लेकिन अंत तक यह छूट गया था। फिर आता है दर्प अर्थात अपनी संपत्ति, रूप या कुल का घमंड होना। संपत्ति कोई बची नहीं थी, कुल छोड़ आया था, रूप-यौवन का दौर भी बीत ही चला था तो राजू गाइड के लिए दर्प भी छूटा। उसके बाद है अभिमान, जिसमें स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को तुच्छ समझा जाए। राजू गाइड के लिए तुलना वाली कोई स्थिति भी नहीं थी। यहाँ तक कि मैं बड़ा साधु, मैं बड़ा भक्त और अन्य मांसाहारी हैं, छोटे-मोटे देवी-देवताओं को पूजते हैं—यह भी नहीं बचा होता। यहाँ तक में दम्भ, दर्प और अभिमान शब्दों में भाव घमंड का ही है, लेकिन अर्थ अलग-अलग हैं, यह भी दिखने लगेगा।
उसके बाद है क्रोध मतलब छोटी-छोटी बातों पर आवेश में आना। पूर्व में उसके अपने गाँव के ग्रामीणों ने, तथाकथित परिवार ने क्या किया या क्या नहीं किया—यह भी राजू गाइड के लिए बचा हुआ नहीं था। जिनपर क्रोध के कारण वो उन्हें छोड़ आया था, वो क्रोध ही नहीं बचा। जिसका भला करो वह जेल भिजवा जाए, या जैसी स्थितियाँ राजू गाइड ने देखी थीं, उसकी भाषा कठोर हो गयी होती, आम लोगों की होती ही है, लेकिन पारुष्य यानी वाणी या व्यवहार में कठोरता और क्रूरता होना भी उससे छूट गया था। इसके बाद बारी आती है अज्ञान यानी कर्तव्य और अकर्तव्य का सही ज्ञान न होना। वह शुरू तो उपवास न करने, ग्रामीणों की सहायता न करने से ही करता है, लेकिन एक साधु का कर्तव्य क्या है, इस पर उसे अंत में कोई संशय भी नहीं रहा।
बाकी केवल मंदिर में जाकर बैठ जाने से ऐसा होगा, उल्टा दान चोरी करने या साथ के दूसरे लोगों की जाति सूंघने तक ही न रह जाएँ, इसके लिए लगातार प्रयास करना पड़ता है। जैसे नहाना हर दिन पड़ता है, गंदे अपने आप हो जाते हैं। बगीचे से खर-पतवार अक्सर चुननी पड़ती है, उग तो अपने आप आते हैं। कुछ वैसे ही भगवद्गीता स्वयं पढ़नी होगी, हमने नर्सरी स्तर का बताया है क्योंकि उतना ही आता था, यह तो याद ही होगा!