अंग्रेजी फिल्म स्पेनिश नाम और भगवद्गीता

किसी अन्य भाषा की फिल्म का नाम भला किसी और भाषा में क्यों रखेंगे? यह सोचते हुए हमने ‘चिकीता’ (Chiquita) देख ली। फिल्म तो अंग्रेजी में है, लेकिन यह नाम ‘चिकीता’ स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका मोटे तौर पर अर्थ होता है—”छोटी लड़की”। हिंदी में जैसे किसी बच्ची को प्यार से ‘छुटकी’ बुला लिया जाए, कुछ वैसा ही।
फिल्म का यह नाम एक छोटी सी घटना पर आधारित है। कहानी एक बाइकर की है, जिसका एक दिन मामूली सा एक्सीडेंट हो जाता है। थोड़ी चोट लगने पर सुस्ताने के लिए बाइकर वहीं सड़क किनारे खेत में पुआल के बंडल पर जाकर लेट जाता है। अचानक उसकी नींद खुलती है और उसे सामने बैठी एक बच्ची दिखाई देती है, जो अपने हुलिए से वहाँ की बिल्कुल नहीं लग रही थी।
बाइकर को उस बच्ची का खुले आकाश के नीचे, देर रात गए अकेले बैठे होना आश्चर्यजनक लगता है। वह उससे पूछने के लिए उठ खड़ा होता है कि इतनी रात गए वह यहाँ क्यों है। चूँकि बच्ची कहीं बाहर की लग रही थी, इसलिए बाइकर को सबसे नजदीकी जगह मेक्सिको लगती है। वह उससे स्पेनिश में बात करने की कोशिश करते हुए उसे ‘चिकीता’ कहकर पुकारता है—और इसी घटना पर फिल्म का नाम रखा गया है। अगली सुबह जब बाइकर किसान की मदद से नजदीकी गैराज जा रहा होता है, तो वह शरणार्थियों और प्रवासियों के बारे में पूछताछ करता है। किसान बताता है कि ‘चिकीता’ उसे भी दिखी तो है, लेकिन वह सभी को दिखाई नहीं देती। इसलिए ‘चिकीता’ के बारे में पूछने पर लोग उसे पागल समझते हैं!
बाइकर या उस किसान को आखिर दिखता क्या था? असल में यह विचार हमें देवी उपासना के प्राचीन हिंदू सिद्धांतों की ओर ले जाता है, जहाँ भगवती का एक स्वरूप ‘श्री बाला त्रिपुरसुंदरी’ का है। दश-महाविद्याओं और अनेक योगिनियों के रूप में जिस प्रकार देवी की उपासना होती है, उसी में से एक यह नौ वर्षीया बालिका का सा दिव्य स्वरूप है। भजनों में जो अक्सर कहा जाता है—”आगम-निगम बखानी…”, उसमें ‘आगम’ (जिसे मोटे तौर पर तंत्र-शास्त्र कहा जाता है) इसी स्वरूप का विवेचन करता है। फिल्म का बाइकर पहले से ही देवी-उपासना की ओर थोड़ा झुकाव रखता था। इस अलौकिक दर्शन के बाद उसके जीवन में कैसे सकारात्मक परिवर्तन आने शुरू होते हैं, फिल्म इसी यात्रा को दर्शाती है।
आपको थोड़े पुराने दौर की लघु-कथाएँ (Short Stories) तो याद होंगी? वे कथाएँ ऐसे मोड़ पर समाप्त होती थीं जहाँ कहानी वास्तव में खत्म नहीं होती थी, बल्कि पाठक के मन में विचार चलने लगते थे कि ‘ऐसा होता तो क्या होता? वैसा होता तो क्या होता?’ अगर फिल्में ऐसी हों तो उन्हें क्या कहेंगे—आर्ट फिल्म? पुराने दौर में कम बजट या व्यावसायिक रूप से सफल न होने वाली फिल्मों को ‘आर्ट मूवी’ घोषित कर देने का भी एक चलन था। कुछ समय पहले अहिल्या की पौराणिक कथा पर बनी एक शॉर्ट-फिल्म यूट्यूब पर देखी थी, तब यह पुनः स्मरण हुआ कि कहानियाँ ‘अनसुलझे मोड़ों’ पर भी समाप्त हो सकती हैं।
तो यह फिल्म भी जहाँ खत्म होती है, वहाँ आप किसी तयशुदा निष्कर्ष या अंतिम निर्णय पर नहीं पहुँचते। अपने दामाद से बात करते बाइकर के दृश्य में आपको किसी भी आम हिंदू का एक ‘इवेंजेलिस्ट’ (धर्म-परिवर्तक) से होने वाला सामना दिखाई दे जाएगा। बाइकर की प्रतिक्रिया भी एक सजग हिंदू जैसी ही होती है। कुल मिलाकर यह देखने योग्य फिल्म है, जो आसानी से ओटीटी या यूट्यूब पर उपलब्ध है।
ओह हाँ! अब तक शायद कुछ लोग सोच रहे होंगे कि देवी की चर्चा आई, फिल्म की बात हुई, लेकिन हमने अपनी परिपाटी के अनुसार भगवद्गीता का कोई श्लोक तो इसमें शामिल किया ही नहीं! इसकी आवश्यकता इसलिए नहीं पड़ी क्योंकि फिल्म के एक दृश्य में सीधे चौथे अध्याय का चौबीसवाँ श्लोक ही दिखाई दे जाता है:
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ (भगवद्गीता ४.२४)
मोटे तौर पर इसका अर्थ है—जिसके प्रति अर्पण किया जा रहा है वह भी ब्रह्म है; जिससे अर्पण किया जा रहा है (जैसे स्रुवा/चम्मच) वह भी ब्रह्म है; जिस अग्नि में हवन किया जा रहा है वह भी ब्रह्म है; और जो हवि (समिधा/सामग्री) अर्पित की जा रही है, वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार यज्ञ की क्रिया और यज्ञ करने वाला—सब ब्रह्मस्वरूप ही हैं। जो मनुष्य हर कार्य और वस्तु में ईश्वर का दर्शन करता है, वह सहज ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। यह श्लोक सनातन परंपरा में भोजन से पूर्व मंत्र (भोजन-मंत्र) के रूप में पढ़ा जाता है—कुछ-कुछ वैसा ही जैसे ईसाई परंपरा में भोजन से पहले ‘ग्रेस’ (Grace) पढ़ने का दृश्य आपने फिल्मों में देखा होगा। यह एक प्राचीन परंपरा है, जिसे आज की ‘शुगर-फ्री’ और आधुनिकता की अंधी दौड़ वाली पीढ़ी भूलने लगी है।
वैसे, देवी-उपासना के संदर्भ में यही अद्वैत भाव देखना हो, तो दुर्गा सप्तशती के कीलक स्तोत्र के “सौभाग्यादि च यत्किञ्चिद् दृश्यते ललनाजने…” वाले भाग में इसे देखा जा सकता है। यही दर्शन श्रीमद्भागवत पुराण (११.२.४५) में भी प्राप्त होता है। हमने जितना बताया है वो नर्सरी के स्तर का है, क्योंकि हमें उतना ही आता था। पीएचडी के लिए आपको भगवद्गीता स्वयं पढ़नी होगी, ये तो याद ही होगा।