साल 1933। कैलिफोर्निया की बर्कले यूनिवर्सिटी में भौतिकी (Physics) पढ़ाते हुए जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर को लगभग चार साल बीत चुके थे। वे विज्ञान की दुनिया के एक चमकते सितारे थे, लेकिन उनके भीतर एक ऐसी दार्शनिक भूख थी जिसे केवल विज्ञान के समीकरण शांत नहीं कर पा रहे थे। इसी दौरान, उनके मित्र हेरोल्ड चेर्निस ने उनका परिचय एक नई दुनिया से कराया—संस्कृत साहित्य की दुनिया।
चेर्निस ने ओपनहाइमर की मुलाकात बर्कले के संस्कृत प्रोफेसर आर्थर डब्ल्यू. राइडर से करवाई, जो ‘पंचतंत्र’ और ‘भगवद गीता’ जैसी महान भारतीय कृतियों का अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिए प्रसिद्ध थे। ओपनहाइमर इस प्राचीन भाषा से इतने मंत्रमुग्ध हुए कि उन्होंने प्रोफेसर राइडर के घर पर संस्कृत की नियमित कक्षाएं लेनी शुरू कर दीं। वे अब सिर्फ अनुवाद नहीं पढ़ रहे थे, बल्कि उन महान ग्रंथों को उनकी मूल भाषा में पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। एक वैज्ञानिक का दोबारा छात्र बन जाना उनके लिए कितना सुखद था, इसका ज़िक्र उन्होंने अपने भाई फ्रैंक को लिखी एक चिट्ठी में किया था: “मैं एक बार फिर से ‘कुछ सीखे जाने’ की उस मधुर ऐश्वर्य का आनंद ले रहा हूँ।”
प्रोफेसर राइडर के साथ ओपनहाइमर ने कई महान संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया। उन्होंने कालिदास के ‘मेघदूत’ को पढ़ा, जिसे 1934 के एक पत्र में उन्होंने “बेहद आनंददायक और जादुई” बताया। इसके अलावा पंचतंत्र और भर्तृहरि का ‘शतकत्रयम्’ भी उनके अध्ययन का हिस्सा बने। लेकिन जिस एक ग्रंथ ने उनके मन और आत्मा पर सबसे गहरी छाप छोड़ी, वह थी भगवद्गीता । सालों बाद, ओपनहाइमर ने स्वीकार किया कि गीता उन चंद किताबों में से एक थी जिसने उनके जीवन जीने के नज़रिए और दर्शन को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया। आज भी न्यू मैक्सिको के लॉस एलामोस स्थित ब्रैडबरी साइंस म्यूजियम में ओपनहाइमर की कुर्सी के ठीक बगल में प्रोफेसर राइडर द्वारा अनुवादित गीता की वह प्रति सुरक्षित रखी हुई है।
इस घटना के ठीक 12 साल बाद, 16 जुलाई 1945 की वह मनहूस और ऐतिहासिक सुबह आई। न्यू मैक्सिको के सुनसान रेगिस्तान में, ट्रिनिटी न्यूक्लियर टेस्ट के दौरान, ओपनहाइमर एक बंकर में खड़े थे। सूरज उगने से पहले ही वहां एक दूसरा, खौफनाक ‘सूरज’ उगा—दुनिया का पहला परमाणु विस्फोट। उस अकल्पनीय चमक और तबाही को देखकर एक पल के लिए समय जैसे ठहर गया था।
सालों बाद, 1965 में एनबीसी (NBC) को दिए एक इंटरव्यू में उस खौफनाक पल को याद करते हुए ओपनहाइमर की आँखों के सामने विज्ञान का कोई नियम नहीं, बल्कि भगवद गीता के ग्यारहवें अध्याय का वह श्लोक तैर गया था, जब भगवान कृष्ण कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को अपना विकराल ‘विश्वरूप’ दिखाते हैं। ओपनहाइमर के मुख से प्रस्फुटित हुआ :
“Now I am become Death, the destroyer of worlds.” (अब मैं मृत्यु बन गया हूँ, दुनिया का विनाशक।)
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।। (भगवद्गीता 11.32)
संस्कृत के मूल श्लोक में ‘काल’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है, जिसका अर्थ ‘समय’ भी होता है और ‘मृत्यु या प्रलय’ भी। प्रोफेसर राइडर ने अपने अनुवाद में इसे कुछ इस तरह लिखा था: “मैं मृत्यु हूँ, और विनाश मेरा वर्तमान कार्य है।” यद्यपि ओपनहाइमर ने जो वाक्य बोला वह संस्कृत का उनका अपना अनुवाद था, लेकिन ‘काल’ को ‘समय’ के बजाय ‘मृत्यु’ (Death) के रूप में व्याख्यायित करने का उनका चुनाव स्पष्ट रूप से प्रोफेसर राइडर की शिक्षाओं का ही प्रभाव था, जो उन्होंने एक दशक पहले ग्रहण की थीं।
आज दुनिया ओपनहाइमर को ‘परमाणु बम के जनक’ और लॉस एलामोस के विनाशकारी प्रोजेक्ट के लिए याद करती है। लेकिन ट्रिनिटी की उस आग से सालों पहले, वह महज़ एक ऐसा जिज्ञासु इंसान था जिसने सिर्फ अपनी आत्मा की शांति और ज्ञान के लिए संस्कृत सीखी थी। और जब मानव इतिहास का सबसे विध्वंसक और जीवन बदल देने वाला पल उनके सामने आया, तो उस वैज्ञानिक के कांपते हुए होंठों ने किसी विज्ञान को नहीं, बल्कि एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ के श्लोक का स्मरण किया ।
गीता और परमाणु बम
