स्याह-सफ़ेद की बाइनरी के अलावा रंग और भी हैं
फिल्म का नायक हमेशा कोई भला सा जीव हो, ऐसा जरूरी नहीं होता। पहले के नायक और खलनायक जहाँ सीधे […]
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राष्ट्रपति चुनाव, पत्रकारिता और उससे जुड़ी राजनीती और षड्यंत्रों के किस्म-किस्म के दांव-पेंच देखने हों तो “आल द प्रेसिडेंट्स मेन” […]
सुबोध घोष की कहानी “जातुगृह” पर बांग्ला फिल्म तो 1965 में बन चुकी थी। उसी कहानी को आधार बनाकर गुलज़ार […]
क्या भगवद्गीता पूरी याद की जा सकती है? श्रुति परम्पराओं से आने वाले ग्रंथों के विषय में हम जानते हैं […]